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Thursday, 14 April 2016

यह नियम करें और हमेशा स्वस्थ रहें


हर कोई अच्छी सेहत और स्वस्थ शरीर की कामना करता हैं। अच्छी सेहत के लिए समतोल आहार लेना जितना आवश्यक है उतना ही आवश्यक हैं आहार को खाने और पचाने के नियमों का पालन करना। इस लेख में हम ऐसी ही कुछ महत्वपूर्ण नियमों का उल्लेख कर रहे है जो आहार के सही पाचन के लिए आवश्यक हैं।
 
जितना महत्त्व हम खाने को देते हैं उतना ही महत्त्व हमें खाना खाने के बाद की जानेवाली क्रिया को भी देना चाहिए। स्वस्थ शरीर और मजबूत पाचन शक्ति के लिए खाना खाने के बाद निचे दी हुई 10 चीजो को नहीं करना चाहिए।
  1. फल / Fruits : खाना खाने के तुरंत बाद कोई भी फल नहीं खाना चाहिए। खाना खाने के तुरंत बाद कोई भी फल खाने से एसिडिटी बढ़ जाती है और गैस की शिकायत हो सकती हैं। अगर आपको फल खाना ही है तो खाना खाने के 2 घंटे बाद या खाना खाने के 1 घंटे पहले कोई फल खाना चाहिए।
  2. चाय / Tea : कुछ लोगो को खाना खाने के तुर्रंत बाद चाय पिने की आदत होती हैं। यह एक बुरी आदत हैं। चाय पिने से एसिडिटी बढ़ सकती है और चाय पिने की वजह से आहार से मिलनेवाले प्रोटीन का ठीक से अवशोषण नहीं होता हैं। अगर चाय पीना है तो खाना खाने के 2 घण्टे बाद ही पीना चाहिए।
  3. नहाना / Bath : कुछ लोगों को खाना खाने के बाद नहाने की आदत होती हैं। खाने के तुरंत बाद नहाने के कारण रक्त का प्रवाह पेट की जगह हात और पैर की तरफ अधिक बढ़ जाता हैं। इस कारण पाचन शक्ति कमजोर हो जाती हैं।
  4. ठंडा पानी / Cold water : आजकल खाने के तुरंत बाद फ्रिज का ठंडा पानी या शीत पेय पिने का चलन ज्यादा बढ़ गया हैं। लोग पहले तो भारी खाना खाते है और फिर ऊपर से ठंडा पानी भी पीते हैं। ठंडा पानी पिने से जाठराग्नि शांत हो जाती है और आहार का पाचन ठीक से नहीं होता हैं। ठंडा पानी पिने की जगह आप खाना खाते समय थोड़ा-थोड़ा साधारण तापमान का पानी ले सकते हैं। खाना खाते समय कोष्ण जल / warm water पीना सेहत के लिहाज से सबसे बेहतर हैं।
  5. चलना / Walking : आपने यह जरूर सुना होंगा की खाने के बाद तुरंत 100 कदम (शत पावली) चलना चाहिए। खाना खान के तुरंत बाद चलने से पेट का रक्त प्रवाह कम हो जाता है जिससे आहार का पाचन नहीं होता हैं। खाना खाने 10 से 15 मिनट के बाद अवश्य चलना चाहिए और यह सेहत के लिए अच्छा भी हैं। आप चाहे तो खाना खाने के बाद 5 से 10 मिनिट तक वाम कुक्षी / left lateral position में लेट सकते हैं। इससे पाचन में मदद हो सकती हैं।
  6. पैंट ढीला करना / Loosening Belt : कुछ लोग खाना खाने के बाद बेल्ट को ढीला कर देते हैं। असल में इतना आहार नहीं लेना चाहिए की आपका पेट पूरा भर जाये और आपको पैंट को ढीला करने की जरुरत पढ़े। खाना खाने के बाद बेल्ट को ज्यादा ढीला न करे, ऐसा करने से मोटापा बढ़ता है और कभी-कभी आंत में गांठ भी पड़ सकती हैं।
  7. सोना / Sleep : खाने कु तुरंत बाद सोना नहीं चाहिए। खाने के बाद तुरंत सोने से खाना ऊपर की और आने से एसिडिटी बढ़ती हैं और पाचन ठीक से नहीं होता हैं। आप चाहे तो केवल 10 मिनिट के लिए वाम कुक्षी में लेट सकते हैं। अगर बैठने या चलने में असमर्थ है तो पूरा लेटने की जगह पीछे तकिया लगाकर सिर की बाजू को पेट की तुलना में ऊपर उठाकर लेटना चाहिए।
  8. पानी / Water : कुछ लोग खाना खाने से तुरंत पहले या खाना खाने के तुरंत बाद अधिक प्रमाण में पानी पीते हैं। यह पाचन और स्वास्थ्य की दृष्टी में हानिकारक हैं। अगर आपको पानी पीना है तो खाना खाते समय थोड़ा- थोड़ा पानी पिए। आप खाना खाने के 1 घंटा पहले या खाना खाने के 2 घंटे बाद पानी ले सकते हैं।
  9. धूम्रपान / Smoking : कुछ लोगों को खाना खाने के तुरंत बाद धूम्रपान करने के शौक रहता हैं। धूम्रपान ऐसे तो किसी भी व्यक्ति ने कभी भी नहीं करना चाहिए पर अगर आप खाना खाने के बाद धूम्रपान करते हैं तो यह एक सिगरेट का असर 10 सिगरेट के समान होता है और आपको कैंसर होने खतरा 50 % से बढ़ा देता हैं।
  10. बैठना / Sitting : यह आदत काम-काजी लोगों को अधिक होती हैं। अक्सर दोपहर का खाना / lunch time खाने के बाद काफी समय तक एक खुर्ची पर बैठे रहते हैं। खाना खाने के 15 मिनट बाद चलने की जगह लंबे समय तक बैठे रहने से यह आदत मोटापे के साथ अनेक गंभीर समस्या को आमंत्रण देने जैसा होता हैां।
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Tuesday, 29 March 2016

अपशकुन के बारे में जाने

अपशकुन  क्या है?

कुछ लक्षणों को देखते ही व्यक्ति के मन में आषंका उत्पन्न हो जाती है कि उसका कार्य पूर्ण नहीं होगा। कार्य की अपूर्णता को दर्षाने वाले ऐसे ही कुछ लक्षणों को हम अपषकुन मान लेते हैं।


अपशकुनों के बारे में हमारे यहां काफी कुछ लिखा गया है, और उधर पष्चिम में सिग्मंड फ्रॉयड समेत अनेक लेखकों-मनोवैज्ञानिकों ने भी काफी लिखा है। यहां पाठकों के लाभार्थ घरेलू उपयोग की कुछ वस्तुओं, विभिन्न जीव-जंतुओं, पक्षियों आदि से जुड़े कुछ अपशकुनों का विवरण प्रस्तुत है।

झाड़ू का अपशकुन 

• नए घर में पुराना झाड़ू ले जाना अशुभ होता है।

• उलटा झाडू रखना अपषकुन माना जाता है।

• अंधेरा होने के बाद घर में झाड़ू लगाना अशुभहोता है। इससे घर में दरिद्रता आती है।

• झाड़ू पर पैर रखना अपशकुन  माना जाता है। इसका अर्थ घर की लक्ष्मी को ठोकर मारना है।

• यदि कोई छोटा बच्चा अचानक झाड़ू लगाने लगे तो अनचाहे मेहमान घर में आते हैं।

• किसी के बाहर जाते ही तुरंत झाड़ू लगाना अशुभ होता है।

दूध का अपषकुन

• दूध का बिखर जाना अशुभ होता है।

• बच्चों का दूध पीते ही घर से बाहर जाना अपशकुन  माना जाता है।

• स्वप्न में दूध दिखाई देना अशुभ माना जाता है। इस स्वप्न से स्त्री संतानवती होती है।

पशुओं का अपशकुन 

• किसी कार्य या यात्रा पर जाते समय कुत्ता बैठा हुआ हो और वह आप को देख कर चौंके, तो विन हो।

• किसी कार्य पर जाते समय घर से बाहर कुत्ता शरीर खुजलाता हुआ दिखाई दे तो कार्य में असफलता मिलेगी या बाधा उपस्थित होगी।

• यदि आपका पालतू कुत्ता आप के वाहन के भीतर बार-बार भौंके तो कोई अनहोनी घटना अथवा वाहन दुर्घटना हो सकती है।

• यदि कीचड़ से सना और कानों को फड़फड़ाता हुआ दिखाई दे तो यह संकट उत्पन्न होने का संकेत है।

• आपस में लड़ते हुए कुत्ते दिख जाएं तो व्यक्ति का किसी से झगड़ा हो सकता है।

• शाम के समय एक से अधिक कुत्ते पूर्व की ओर अभिमुख होकर क्रंदन करें तो उस नगर या गांव में भयंकर संकट उपस्थित होता है।

• कुत्ता मकान की दीवार खोदे तो चोर भय होता है।

• यदि कुत्ता घर के व्यक्ति से लिपटे अथवा अकारण भौंके तो बंधन का भय उत्पन्न करता है।

• चारपाई के ऊपर चढ़ कर अकारण भौंके तो चारपाई के स्वामी को बाधाओं तथा संकटों का सामना करना पड़ता है।

• कुत्ते का जलती हुई लकड़ी लेकर सामने आना मृत्यु भय अथवा भयानक कष्ट का सूचक है।

• पशुओं के बांधने के स्थान को खोदे तो पशु चोरी होने का योग बने।

• कहीं जाते समय कुत्ता श्मषान में अथवा पत्थर पर पेषाब करता दिखे तो यात्रा कष्टमय हो सकती है, इसलिए यात्रा रद्द कर देनी चाहिए। गृहस्वामी के यात्रा पर जाते समय यदि कुत्ता उससे लाड़ करे तो यात्रा अषुभ हो सकती है।

• बिल्ली दूध पी जाए तो अपशकुन  होता है।

• यदि काली बिल्ली रास्ता काट जाए तो अपशकुन  होता है। व्यक्ति का काम नहीं बनता, उसे कुछ कदम पीछे हटकर आगे बढ़ना चाहिए।

• यदि सोते समय अचानक बिल्ली शरीर पर गिर पड़े तो अपशकुन  होता है।

• बिल्ली का रोना, लड़ना व छींकना भी अपशकुन है।

• जाते समय बिल्लियां आपस में लड़ाई करती मिलें तथा घुर-घुर शब्द कर रही हों तो यह किसी अपशकुन  का संकेत है। जाते समय बिल्ली रास्ता काट दे तो यात्रा पर नहीं जाना चाहिए।

• गाएं अभक्ष्य भक्षण करें और अपने बछड़े को भी स्नेह करना बंद कर दें तो ऐसे घर में गर्भक्षय की आषंका रहती है। पैरों से भूमि खोदने वाली और दीन-हीन अथवा भयभीत दिखने वाली गाएं घर में भय की द्योतक होती हैं।

• गाय जाते समय पीछे बोलती सुनाई दे तो यात्रा में क्लेशकारी होती है।

• घोड़ा दायां पैर पसारता दिखे तो क्लेश होता है।

• ऊंट बाईं तरफ बोलता हो तो क्लेशकारी माना जाता है।

• हाथी बाएं पैर से धरती खोदता या अकेला खड़ा मिले तो उस तरफ यात्रा नहीं करनी चाहिए। ऐसे में यात्रा करने पर प्राण घातक हमला होने की संभावना रहती है।

• प्रातः काल बाईं तरफ यात्रा पर जाते समय कोई हिरण दिखे और वह माथा न हिलाए, मूत्र और मल करे अथवा छींके तो यात्रा नहीं करनी चाहिए।

• जाते समय पीठ पीछे या सामने गधा बोले तो बाहर न जाएं।

पक्षियों का अपशकुन 

सारस बाईं तरफ मिले तो अशुभ फल की प्राप्ति होती है।

सूखे पेड़ या सूखे पहाड़ पर तोता बोलता नजर आए तो भय तथा सम्मुख बोलता दिखाई दे तो बंधन दोष होता है।

मैना सम्मुख बोले तो कलह और दाईं तरफ बोले तो अषुभ हो।

बत्तख जमीन पर बाईं तरफ बोलती हो तो अशुभ फल मिले।

बगुला भयभीत होकर उड़ता दिखाई दे तो यात्रा में भय उत्पन्न हो।

यात्रा के समय चिड़ियों का झुंड भयभीत होकर उड़ता दिखाई दे तो भय उत्पन्न हो।

घुग्घू बाईं तरफ बोलता हो तो भय उत्पन्न हो। अगर पीठ पीछे या पिछवाड़े बोलता हो तो भय और अधिक बोलता हो तो शत्रु ज्यादा होते हैं। धरती पर बोलता दिखाई दे तो स्त्री की और अगर तीन दिन तक किसी के घर के ऊपर बोलता दिखाई दे तो घर के किसी सदस्य की मृत्यु होती है।

कबूतर दाईं तरफ मिले तो भाई अथवा परिजनों को कष्ट होता है।

लड़ाई करता मोर दाईं तरफ शरीर पर आकर गिरे तो अशुभ माना जाता है।

लड़ाई करता मोर दाईं तरफ शरीर पर आकर गिरे तो अशुभ माना जाता है।

अपशकुनों से मुक्ति तथा बचावके उपाय

विभिन्न अपशकुनों से ग्रस्त लोगों को

निम्नलिखित उपाय करने चाहिए।

यदि काले पक्षी, कौवा, चमगादड़

आदि के अपशकुन  से प्रभावित हों तो अपने इष्टदेव का ध्यान करें या अपनी राषि के अधिपति देवता के मंत्र का जप करें तथा धर्मस्थल पर तिल के तेल का दान करें।

अपशकुनों के दुष्प्रभाव से बचने के लिए धर्म स्थान पर प्रसाद चढ़ाकर बांट दें।

छींक के दुष्प्रभाव से बचने के लिए निम्नोक्त मंत्र का जप करें तथा चुटकी बजाएं।

क्क राम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम जपेत्‌ तुल्यम्‌ राम नाम वरानने॥

अषुभ स्वप्न के दुष्प्रभाव को समाप्त करने के लिए महामद्यमृत्युंजय के निम्नलिखित मंत्र का जप करें।

क्क ह्रौं जूं सः क्क भूर्भुवः स्वः क्क त्रयम्बकम्‌ यजामहे सुगन्धिम्‌ पुच्च्िटवर्(नम्‌ उर्वारूकमिव बन्धनान्‌ मृत्योर्मुक्षीयमाऽमृतात क्क स्वः भुवः भूः क्क सः जूं ह्रौं॥क्क॥

श्री विष्णु सहस्रनाम पाठ भी सभी अपषकुनों के प्रभाव को समाप्त करता है।

सर्प के कारण अषुभ स्थिति पैदा हो तो जय राजा जन्मेजय का जप 21 बार करें।

रात को निम्नोक्त मंत्र का 11 बार जप कर सोएं, सभी अनिष्टों से भुक्ति मिलेगी।

बंदे नव घनष्याम पीत कौषेय वाससम्‌। सानन्दं सुंदरं शुद्धं श्री कृष्ण प्रकृते

Monday, 28 March 2016

मधुमेह के रोगी का आहार

आभार - डॉ. प्रीति शुक्ला
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मधुमेह के रोगी का आहार केवल पेट भरने के लिए ही नहीं होता, उसके शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा को संतुलित रखने में सहायक होता है। चूंकि यह रोग मनुष्य के साथ जीवन भर रहता है इसलिए जरूरी है कि वह अपने खानपान पर हमेशा ध्यान रखे। आमतौर मरीज ब्लडशुगर की नार्मल रिपोर्ट आते ही लापरवाह हो जाता है। मधुमेह के मरीज के मुंह में गया हर कौर उसके स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। इसलिए जो भी खाएं सोच समझकर खाएं।


इन्सुलिन हार्मोन के स्रावण में कमी से डायबिटीज रोग होता है। डायबिटीज आनुवांशिक या उम्र बढ़ने पर या मोटापे के कारण या तनाव के कारण हो सकता है। डायबिटीज ऐसा रोग है जिसमें व्यक्ति को काफी परहेज से रहना होता है। बदपरहेजी करने के दूरगामी परिणाम बुरे होते है। मधुमेह के रोगी को आंखों व किडनी के रोग, सुन्नपन आना जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इसलिए सदैव यही प्रयत्न करना चाहिए कि ब्लड ग्लूकोज लेवल फास्टिंग 70-110 मिलीग्राम/ डीएल व खाना खाने के 2 घंटे बाद का 100-140 मिलीग्राम डीएल बना रहे। इसके लिए इन्हें खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 45 मिनट से 1 घंटा तीव्र गति से पैदल चलना या अन्य कोई भी व्यायाम करना चाहिए। सही समय पर दवाई या इंसुलिन लेना चाहिए। डायबिटिक व्यक्ति को अपने वजन व लंबाई के अनुसार प्रस्तावित कैलोरीज से 5 प्रश कम कैलोरी का सेवन करना चाहिए।

उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति की लंबाई 5 फुट 4 इंच है तो उसका आदर्श वजन 55 किग्रा होना चाहिए। व्यक्ति की क्रियाशीलता यदि कम है, जैसे कि वह बैठे-बैठे कार्य करता है तो उसे 2400 कैलोरी लेना चाहिए। डायबिटिक हो तो इसका 5 प्रश कम अर्थात 2280 कैलोरी आहार उसके लिए सही रहेगा।

यदि वह मोटा हो तो उसे 200-300 कैलोरी और घटा देना चाहिए। ब्लड ग्लूकोज लेवल फास्टिंग 70-110 मिलीग्राम/ डीएल व खाना खाने के 2 घंटे बाद का 100-140 मिलीग्राम डीएल बना रहे। इसके लिए इन्हें खान-पान का विशेष ध्यान रखना चाहिए। 45 मिनट से 1 घंटा तीव्र गति से पैदल चलना या अन्य कोई भी व्यायाम करना चाहिए।

सामान्य डायबिटिक व्यक्ति को अपने आहार में कुल कैलोरी का 40 प्रश कार्बोहाइड्रेटयुक्त पदार्थों से, 40 प्रश फेट (वसा) युक्त पदार्थों से व 20 प्रश प्रोटीनयुक्त पदार्थों से लेना चाहिए। एक वयस्क अधिक वजनी डायबिटिक व्यक्ति को 60 प्रश कार्बोहाइड्रेट से, 20 प्रश फेट से व 20 प्रश प्रोटीन से कैलोरी लेना चाहिए।


डायबिटिक व्यक्ति को प्रोटीन अच्छी मात्रा में व उच्च गुणवत्ता वाला लेना चाहिए जैसे दूध, दही, पनीर, अंडा, मछली, सोयाबीन आदि का सेवन करना चाहिए। इंसुलिन ले रहे डायबिटिक व्यक्ति एवं गोलियाँ ले रहे डायबिटिक व्यक्ति को खाना सही समय पर लेना चाहिए।

ऐसा न करने पर हायपोग्लाइसीमिया हो सकता है, जिसके लक्षण निम्न हैं- (1) कमजोरी लगना, (2) अत्यधिक भूख लगना, (3) पसीना आना, (4) नजर से धुंधला या डबल दिखना, (5) हृदयगति तेज होना, (6) झटके आना एवं गंभीर स्थिति होने पर कोमा भी हो सकता है।


इसलिए डायबिटिक व्यक्ति को हमेशा अपने साथ कोई मीठी चीज जैसे ग्लूकोज, शकर, चॉकलेट, मीठे बिस्किट में से कुछ रखना चाहिए एवं ऐसे लक्षण होने पर तुरंत इनका सेवन करना चाहिए। एक सामान्य डायबिटिक व्यक्ति को अपने आहार में निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए कि वे थोड़ी-थोड़ी देर में कुछ खाते रहें। दो या ढाई घंटे में कुछ खाएं। एक समय पर बहुत सारा खाना न खाएं।

तले हुए पदार्थ, मिठाइयां, बेकरी के पदार्थों से परहेज करें। दूध सदैव डबल टोन्ड (स्किम्ड मिल्क) का प्रयोग करें। कम कैलोरीयुक्त खाद्य पदार्थों का सेवन करें जैसे भुना चना छिलके वाला, परमल, अंकुरित अनाज, सूप, सलाद आदि का ज्यादा सेवन करें। दही (स्किम्ड मिल्क) से बनाया हुआ ले सकते हैं। छाछ का सेवन श्रेयस्कर होता है।

मैथीदाना (दरदरा पिसा हुआ) 1/2-1 चम्मच खाना खाने के 15-20 मिनट पहले लेने से शुगर कंट्रोल में रहती है व फायदा होता है। रोटी के आटे को बिना चोकर निकाले प्रयोग में लाएं व इसकी गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इसमें सोयाबीन मिला सकते हैं।

घी व तेल का सेवन दिनभर में 20 ग्राम (4 चम्मच) से ज्यादा नहीं होना चाहिए। अतः सभी सब्जियों को कम से कम तेल का प्रयोग करके नॉनस्टिक कुकवेयर में पकाना चाहिए। हरी पत्तेदार सब्जियां खाना चाहिए। अपनी कैलोरीज का निर्धारण कुशल डायटिशियन से बनाकर उसके अनुसार चलें तो अवश्य ही लाभ होगा व भोजन में विकल्प ज्यादा मिल सकते हैं जिससे आपका भोजन वैरायटी वाला हो सकता है व बोरियत नहीं होगी।

Thursday, 24 March 2016

योग का महत्व



यह प्रमाणित तथ्य हैं की योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है, योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है.

हम मनुष्य किसी चीज़ की ओर तभी आकर्षित होते हैं जब उनसे हमें लाभ मिलता है. जिस तरह से योग के प्रति हमलोग आकर्षित हो रहे हैं वह इस बात का संकेत हैं कि योग के कई फायदे हैं. योग को न केवल हमारे शरीर को बल्कि मन और आत्मिक बल को सुदृढ़ और संतुष्टि प्रदान करता है. दैनिक जीवन में भी योग के कई फायदे हैं, आइये! इनसे परिचय करें.
स्त्री पुरूष, बच्चे, युवा, वृद्ध सभी के लिए योग लाभप्रद और फायदेमंद है. शरीर क्षमताओं एवं लोच के अनुसार योग में किसी परिवर्तन और बदलाव किया जा सकता है. किसी भी स्थिति में योग लाभप्रद होता है.


मन और भावनाओं पर योग
जीवन में सकारात्मक विचारों का होना बहुत आवश्यक है. निराशात्मक विचार असफलता की ओर ले जाता है. योग से मन में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है. योग से आत्मिक बल प्राप्त होता है और मन से चिंता, विरोधाभास एवं निराशा की भावना दूर हो जाती है. मन को आत्मिक शांति एवं आराम मिलता है जिससे मन में प्रसन्नता एवं उत्साह का संचार होता है. इसका सीधा असर व्यक्तित्व एवं सेहत पर होता है.




तनाव से मुक्ति (Stress relief through Yoga)तनाव अपने आप में एक बीमारी है जो कई अन्य बीमारियों को निमंत्रण देता है. इस तथ्य को चिकित्सा विज्ञान भी स्वीकार करता है. योग का एक महत्वपूर्ण फायदा यह है कि यह तनाव से मुक्ति प्रदान करता है. योग मुद्रा, ध्यान और योग में श्वसन की विशेष क्रियाओं द्वारा तनाव से राहत मिलती है, यह प्रमाणित तथ्य है. योग मन को विभिन्न विषयों से हटाकर स्थिरता प्रदान करता है और कार्य विशेष में मन को स्थिर करने में सहायक होता है. तनाव मुक्त होने से शरीर और मन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है. कार्य करने की क्षमता भी बढ़ती है.

मानसिक क्षमताओं का विकास (Mental Functions improvement through Yoga)
स्मरण शक्ति एवं बौद्धिक क्षमता जीवन में प्रगति के लिए प्रमुख साधन माने जाते हैं. योग से मानसिक क्षमताओं का विकास होता है और स्मरण शक्ति पर भी गुणात्मक प्रभाव होता है. योग मुद्रा और ध्यान मन को एकाग्र करने में सहायक होता है. एकाग्र मन से स्मरण शक्ति का विकास होता है. प्रतियोगिता परीक्षाओं में तार्किक क्षमताओं पर आधारित प्रश्न पूछे जाते हैं. योग तर्क शक्ति का भी विकास करता है एवं कौशल को बढ़ता है. योग की क्रियाओं द्वारा तार्किक शक्ति एवं कार्य कुशलता में गुणात्मक प्रभाव होने से आत्मविश्वास भी बढ़ता है.

शरीर में लोच (Physical Functions improvement through Yoga)
योग से शरीर मजबूत और लचीला होता है. योग मांसपेशियों को सुगठित और शरीर को संतुलित रखता है. सुगठित और संतुलित और लोचदार शरीर होने से कार्य क्षमता में भी वृद्धि होती है. कुछ योग मुद्राओं से शरीर की हड्डियां भी पुष्ट और मजबूत होती हैं. यह अस्थि सम्बन्धी रोग की संभावनाओं को भी कम करता है.

सेहत और योग (Yoga and Health)
योग शरीर को सेहतमंद बनाए रखता है और कई प्रकार की शरीरिक और मानसिक परेशानियों को दूर करता है. योग श्वसन क्रियाओं को सुचारू बनाता है. योग के दौरान गहरी सांस लेने से शरीर तनाव मुक्त होता है. योग से रक्त संचार भी सुचारू होता है और शरीर से हानिकारक टाँक्सिन निकल आते हैं. यह थकान, सिरदर्द, जोड़ों के दर्द से राहत दिलाता है एवं ब्लड प्रेसर को सामान्य बनाए रखने में भी सहायक होता है.

Wednesday, 23 March 2016

मधुमेह Diabetes की आहार चिकित्सा


आहार नियंत्रण

मधुमेह के रोगियों के लिए अपने भोजन पर नियंत्रण रखना अत्यंत आश्यक है। कई बार इन्सुलिन लेने वाले मधुमेह के रोगियों को जो भोजन तालिका चिकित्सा द्वारा बतायी जाती है उसमें चाय एवं काफी का भी उल्लेख होता है। उन्हें सिर्फ क्रीम और शर्करा न लेने के लिए कहा जाता है। चाय और काफी का प्रयोग मधुमेह से ग्रस्त किसी भी व्यक्ति के लिए न करना ही श्रेयस्कर है, चाहे वह इन्सुलिन पर निर्भर हो अथवा नहीं। ये पदार्थ अच्छे स्वास्थ के निर्माण में सहायक नहीं होते हैं। ऐसे रोगियों को कई बार चिकित्सकों द्वारा डबलरोटी, अचार, अंडे आदि लेने की सलाह भी दी जाती है पर हमें यह ध्यान रखना चाहिए की ये पदार्थ मधुमेह के रोगी के लिए आवश्यक खाद्य पदार्थों की श्रेणी में नहीं आते हैं।

मधुमेह से ग्रस्त रोगियों को किसी भी वस्तु से अधिक ताजी, हरी सब्जियों की आवश्यकता होती है । प्रत्येक भोजन के साथ सलाद प्रचुर मात्रा में लिया जाना चाहिए । जब हम आधिक मात्रा में फल एवं सब्जियां लेते हैं तो शरीर में अधिक पानी पहूंचता है । यह गुर्दों एवं मूत्र उत्सर्जन तंत्र के लिए आवश्यक है । मधुमेह की स्थिति में हमें अपने गुर्दों एवं मूत्र उत्सर्जन तंत्र को अच्छी हालत में रखना चाहिए क्योंकी यह रोग गुर्दों पर एक प्रकार का तनाव डालता है । मधुमेह के रोगियों को मिठाई, चाय. काफी, मादक द्रव्यों तथा ध्रूमपान आदि को तुरंत बंद कर देने का प्रयास करना चाहिए । चर्बी और शर्करा दोनों में कमी आने से आश्चर्य और उत्साहवर्धक परिणाम सामने आते हैं ।

मधुमेह से ग्रस्त व्यक्ति को यह भलीभांति समझ लेना चाहिए है की यदि वह असमानता से खाना शुरू कर देगा तो शरीर उस भोजन के अनुकूल हो जाएगा । प्राय: देखा गया है कि अधिकांश व्यक्ति अपने वजन एवं शरीर के आकार-प्रकार को परिवर्तित करना नहीं चाहते । मधुमेह से ग्रस्त बहूत से व्यक्ति भोजन की अपनी आदतों के कारण ही पेट की तकलीफों, कब्ज तथा यकृत के विकारों सी पीड़ित रहते हैं ।

आहार नियंत्रण की आवश्यकता
सामान्य जीवन व्यतीत करने के लिए मधुमेह के रोगी को आहार नियंत्रण के नियमों का पालन करना चाहिए । यहाँ इस बात पर भी ध्यान रखना जरूरी है की मधुमेह के रोगी की आयु और रोग की स्थिति पर ही उसका आहार निर्भर करता है । इसलिए एक ही आहार मधुमेह के सभी रोगियों को नहीं दिया जा सकता ।

आहार नियंत्रण में उपयोगी बातें
मधुमेह के रोगियों को अपना आहार निर्धारण करते समय किन- किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए -
मधुमेह के प्रत्येक रोगी का उद्येश्य यही होना चाहिए की वह अपनी रक्त शर्करा के स्तर को यथासम्भव नियंत्रण में रखे । आहार इस उद्येश्य की पूर्ति में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है इसलिए मधुमेह के रोगी को अपने आहार का निर्धारण करे समय निम्नलिखित सिद्धांतों को आवश्यक रूप से ध्यान में रखना चाहिए ।
आहार संतुलित हो जिसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट तथा वसा आदि प्रदान करने वाले तत्व आवश्यक मात्रा में हों ।
शरीर के लिए आवश्यक विटामिन, खनिज लवण तथा फाइबर आदि पर्याप्त मात्रा में होना
शरीर का वजन आदर्श बनाए रखने के लिए उपयुक्त कैलोरी आहार द्वारा शरीर को मिलती रहें ।
मधुमेह की जटिलताएँ उत्पन्न होने पर उनका नियमन किया जाना संभव हो ।
रोगी का आहार विविधता पूर्ण हो ताकि वह अच्छी तरह से ग्रहण किया जा सके । आहार नियंत्रण के नाम पर कड़वी चीजें खाते- खाते कई बार रोगियों को इससे आरूचि हो जाती है । अत: आहार निर्धारण में रोगियों की रुचि का ध्यान रखना भी अत्यंत आवश्यक हैं ।

आहार की रूपरेखा
मधुमेह के रोगी के आहार की रूपरेखा बनाते समय उससे चिकित्सक को संबधित निम्नलिखित बातों को आवश्य ध्यान में रखना चाहिए –

1-रहन सहन का स्तर
2-आजीविका
3-आर्थिक स्थिति
4-भोज्य पदार्थो की उपलब्धी
5-भोज्य पदार्थों का मूल्य
6-सामाजिक प्रतिबंध
7-सामाजिक परम्पराएँ
8-धर्म
9-पारिवारिक स्थिति
10-रोगी की आयु
11-लिंग
12-ऊँचाई
13-शरीर का वजन
14-रोग की तीव्रता
15-रोगी की अभिरूचि

रोगी के आहार की महत्वपूर्ण जानकारियां
प्रसिद्ध चिकित्सा डॉ. हीरालाल ने अपने पुस्तक “स्वस्थ आहार एवं रोगों की चिकित्सा” में इसका विस्तृत वर्णन किया है । उनके अनुसार मधुमेह समृद्धता का रोग है । अति भोजन तथा मोटापे के कारण मधुमेह के प्रत्येक चार में से तीन रोगियों का वजन अधिक होता है । इसलिए ऐसे रोगियों को केवल चीनी एवं परिष्कृत कार्बोहाइड्रेट ही नहीं बल्कि अति प्रोटीन एवं चिकनाई से भी बचना चाहिए ।

मधुमेह के रोगी का सर्वोत्तम आहार प्राकृतिक खाद्य, अंकुरित, अन्नकण, फल एवं हरी सब्जी है । यह क्षारीय आहार है । पूर्ण अन्न, कूटू एवं हरी सोया, मेथी अत्यंत लाभप्रद हैं । फलों में संतरा जामुन, अनानास, आवंला, सेब तथा पपीता आदि लिए जा सकते हैं । मट्ठा विशेष रूप से उपयोगी है ।

आहार में कम से कम 90 प्रतिशत अपक्वाहार होना ही चाहिए । अपक्वाहार से अग्नाशय ग्रन्थि उद्दीप्त होकर इन्सुलिन उत्पन्न करती है । अति आहार बंद करके एक बार में अधिक भोजन करने की अपेक्षा चार बार थोड़ा-थोड़ा खाना निरापद है । मधुमेह में प्रोटीन एवं चिकनाई का चयापचय मंद होने से अम्लता बढती है । अत: क्षारीय भोजन उपयुर्क्त है । लहसून से रक्त शर्करा घटती है । जैविकीय उपचारों में पर्याप्त व्यायाम एवं संयमित आहार, खुली हवा में खेलने, दौड़ने, टहलने एवं तैरने में चयापचय क्रिया तेज होती है ।

निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान देना चाहिए :-
लंबा नहीं बल्कि दो – तीन दिन का रसोपवास सर्वोत्तम ।
शारीरिक एवं मानसिक तनाव से सदा बचना चाहिए ।
कब्ज न रहे इसका ध्यान रखना चाहिए ।
शुष्क घर्षण अवश्य करना चाहिए । इससे चयापचय उन्नत होता है ।
मैगनीज प्रधान खाद्य लेना चाहिए ।

मधुमेह के रोगियों को अजवाइन, सोया, मेथी तथा गाजर की पत्ती का रस दिया जा सकता है । खट्टे फल, लौकी, खीरा, एवं काकड़ी अग्नाशय ग्रंथि को उन्नत करते हैं । प्याज एवं लहसून का रस उपयोगी है अत: इनका रस अन्य सब्जीयों के रस में मिलाना चाहिए ।

फ्रेंचबीन, मकोय की पत्ती, बेल की पत्ती, करेला, अल्फाल्फा, चौलाई, सोया, मेथी, जामुन की पत्ती आदि लेना चाहिए। संतरे का छ्लिका बहूत ही उपयोगी है। सुबह, दोपहर एवं शाम को दिन में तीन बार इसका काढ़ा बनाकर पीना चाहिए । परिष्कृत एवं प्रक्रियागत खाद्यों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। रोजाना एक घंटे का शारीरिक श्रम मधुमेह के रोगियों के लिए अनिवार्य है ।

रोजाना बेल की पत्तीयों का रस 25 से 50 मि. ली. लेना चाहिए । करेला एवं कूंदरू की पत्ती का रस भी 20 मि. ली. लिया जा सकता है। मधुमेह में नेत्र ज्योति घटती है अत: विटामिन ए, बी काम्प्लेक्स तथा विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में लेना चाहिए ।
तरल पदार्थ से संबंधित जानकारियां

मधुमेह का एक रोगी कितनी मात्रा में स्टार्च एवं शर्करायुक्त चीजें ले सकता है-
ग्लूकोज के अक्सिकारण के लिए इन्सुलिन की आवश्यकता होती है। आक्सिकरण की यह प्रकीया शरीर के लिए ऊर्जा उत्पन्न करती है। जब इन्सुलिन की काफी मात्रा उत्पदित नहीं होती तो उसका परिणाम मधुमेह के रूप में सामने है इसलिए स्टार्च युक्त खाद्यपदार्थ अन्य साधारण लोगों की अपेक्षा मधुमेह से पीड़ित व्यक्तियों के आहार का अधिक आवश्यक होते हैं।

शहद एवं कई फल जैसे अंजीर आदि तथा कुछ सब्जियाँ जैसे गाजर एवं चुकन्दर आदि में फ्रक्टोज शर्करा होती है जिसे फल शर्करा का नाम से भी जाना जाता है। फ्रक्टोज शर्करा मधुमेह से ग्रस्त लोगों के लिए विशेष रूप से उपयोगी होती है । मधुमेह से ग्रस्त रोगी के बारे में हमें यह जानने का प्रयास करना चाहिए कि शर्करा एवं स्टार्च की मात्रा किस स्तर तक शरीर ग्रहण कर सकता है । कभी-कभी स्टार्च की मात्रा किस स्तर तक शरीर ग्रहण कर सकता है। कभी – कभी स्टार्च की मात्रा एकदम से घटा दी जाती है और बहुत सारे मीठे खाद्य पदार्थ, मिठाई एवं स्टार्च जो एक सामान्य आदमी खाता है, एक साथ कम किए जा सकता हैं । यह मधुमेह की तीव्रता और ग्रहण किए जाने वाली इन्सुलिन की मात्रा पर निर्भर करता है की स्टार्च युक्त खाद्य पदार्थों की कितनी मात्रा ली जा सकती है। हम इसे रक्त शर्करा एवं मूत्र परीक्षणों से नियंत्रण कर सकते हैं।
ग्लाइसिमिक इंडेक्स,ग्लाइसिमिक लोड और ग्लाइमिक रेस्पोंस

मधुमेह के आहार के बारे में चर्चा करते समय ग्लाइसिमिक इंडेक्स ग्लाइसिमिक लोड और ग्लाइमिक रेस्पोंस का जिक्र आता है । ये क्या हैं ?
ये मधुमेह से संबंधित सूचायाकंक हैं जिनका प्रयोग चिकित्सकों द्वारा किया जाता है। ग्लाहसिमिक इंडेक्स है जो खाद्य पदार्थों में मौजूद कार्बोहाइड्रेट के ग्लूकोज में बदलने के आधार पर उन खाद्य पदार्थों को 0-100 के बीच स्थान देता है। एक अनुसंधान के अनुसार हर खाने में मौजूद शर्करा के कारण रक्त में शर्करा का स्तर नहीं बढ़ता है। ग्लाइसिमिक लोड ( जी. एल.): जी. आई. और खाने की कुल मात्रा मिलकर जी. एल. का पता लगाया जाता है। जी. एल. रक्त शर्करा में बढ़ोत्तरी मात्रा को निर्धारित करता है।

ग्लाइसिमिक रिस्पोंस ( जी.आर.) यह एक महत्वपूर्ण सूचकांक है। यह शरीर की वह रफ्तार है जिससे एह खाद्य पदार्थ के ग्लूकोज को रक्त शर्करा में बदलता है।

दैनिक आहार का नमूना चार्ट

आप मधुमेह के एक रोगी को दिए जाने वाले दैनिक आहार का नमूना चार्ट बना सकते हैं
मधुमेह के प्रत्येक रोगी को दिया जाने वाला आहार उस रोगी की व्यक्तिगत आवश्यकताओं एवं जीवनशैली के हिसाब से निश्चित किया जाना चाहिए । आहार चार्ट बनाते समय रोगी की आयु, उसका वजन उसके कार्य की प्रकृति, दिनचर्या तथा आवश्यक कैलोरियों की मात्रा आदि को ध्यान में रखा जाना चाहिए । लगभग 1500 कैलोरी उपलब्ध कराने वाले आहार की नमूना तालिका इस प्रकार बनाया जा सकता है :-

प्रात: काल- एक गिलास गूनगूने पानी में आधा निम्बू निचोड़ कर लें या मेथी आथवा आंवले का पानी लें ।

नाश्ता (8 बजे ) – एक कटोरी दही या अंकुरित मूंग एवं मेथी या एक गिलास छाछ ।

भोजन (11 से 12 बजे) – गेहूं, जौ, चना एवं मेथी को मिला कर उस आटे की रोटियाँ2, उबली हुई सब्जी, सलाद, अंकुरित मूंग की दाल या एक कटोरी दही, आंवले की चटनी ।

सांयकाल (4 बजे) – (प्रात: काल की तरह) – सब्जी का सूप या भुने हुए चने या नींबू एवं पानी

भोजन (7 बजे) – रोटी. सब्जी एवं सलाद (दोपहर की तरह) यह एक नमूना चार्ट है । रोगी के रक्त में शर्करा की स्थिति को देखते हुए तथा चिकित्सक के निर्देशानुसार इसमें आवश्यक परिवर्तन किये जा सकते है ।
आहार पर नियंत्रण रखना काफी

मधुमेह के नियंत्रण के लिए क्या केवल आहार पर नियंत्रण रखना काफी है ?
मधुमेह के अधिकतर रोगी इन्सुलिन पर अनिर्भर श्रेणी के होते हैं । इनमें से अधिकांश में रोग पर नियंत्रण रखने के लिए आहार पर नियंत्रण रखना शायद काफी हो सकता है । किन्तु ऐसे रोगियों का आहार नियंत्रण होने के साथ-साथ पोषण की दृष्टि से संतुलित भी होना चाहिए । यही नहीं आहार का निर्धारण करते समय रोगी की आयु, व्यवसाय, शारीरिक वजन तथा रोग की स्थिति आदि को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए ।
खानपान पर नियंत्रण रखना आवश्यक

मधुमेह के नियंत्रित हो जाने के बाद भी खानपान पर नियंत्रण रखना आवश्यक है-
चिकित्सक मधुमेह को जीवन भर के रोग की संज्ञा देते हैं ।इसलिए मधुमेह को नियंत्रण में रखने के लिए हमेशा आहार संबंधी संतुलन बनाए रखना चाहिए । आहार में की गई गड़बड़ी रक्त में शर्करा की स्थिति को पुन: अनियंत्रित कर सकती है । इसलिए आहार का निर्धारण गंभीरता से सोच –विचार कर एवं विविधतापूर्ण ढंग से किया जाना चाहिए। ताकि निरंतर नियंत्रित आहार लेने से रोगी में भोजन के प्रति अरूचि उत्पन्न न हो । धनिया, जीरा, काली मिर्च, नींबू तथा आँवला जैसे पदार्थों का उपयोग भोजन को स्वादिष्ट एवं रूचिकर बनाने में किया जा सकता है । मधुमेह के रोगियों को अपने खान - पान का समय निश्चित कर सदैव उसका पालन करने का प्रयास करना चाहिए क्योंकी इसके बिना रक्त में शर्करा की मात्रा को सामान्य स्तर पर बनाए रखना संभव नहीं होगा ।

आहार में ‘फाइबर’ की उपयोगिता
मधुमेह के रोगी के आहार में ‘फाइबर’ के क्या उपयोगिता है ?
फाइबर का अर्थ है – मोटे रेशेदार पदार्थ । मधुमेह के रोगी के आहार में ‘फाइबर’ की मात्रा अधिक होनी चाहिए । ये भोजन के बाद रक्त में शर्करा के स्तर को बढ़ने नहीं देते । ये कब्ज को दूर करते हैं तथा रक्त में ट्राईग्लिसराइड्स तथा कोलेस्ट्रोल के स्तर को भी कम करते हैं । ये वजन कम करने में भी सहायता पहुंचाते हैं । हरी पत्ती वाली सब्जियाँ, मेथी तथा चोकर आदि से फाइबर की पूर्ति की जा सकती है । आधुनिक अध्ययनों ने भी इस बात को प्रादर्शित किया है ।

चोकर का नियमित प्रयोग मधुमेह के अलावा हृदय रोगियों के लिए भी लाभदायक है । “हिन्दुस्तान” समाचार पत्र में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट के अनुसार “मात्र 10 ग्राम चोकर आप के दिल की रक्षा कर सकता है । अगर आप अपने खाने में रोजाना 10 ग्राम फाइबर जैसे – चोकर आदि को और बढ़ा दें तो दिल की बीमारी की संभावना 27 प्रतिशत कम जो जाती है ।” यह शोध किया है अमेरिका डाक्टर मैकयोन ने ।

इस शोध के अनुसार हर व्यक्ति को कम से कम रोजाना 37 ग्राम फाइबर जरूर अपने भोजन में शामिल करना चाहिए। वैसे आम आदमी के भोजन में 15 से 20 ग्राम फाइबर शामिल रहता है। इसे 10 ग्राम और बढ़ा दें तो दिल की बीमारी से बचा जा सकता है । डॉ. मैकयोन ने अपने शोध में पाया है की ऐसी चीजें जिनसे स्टार्च बनता है, कम खानी चाहिए या एकदम ही नहीं खानी चाहिए, क्योंकी इनकी भूमिका मानव शरीर में चीनी की तरह होती है। स्टार्च युक्त चीजें रक्त में पहुँच कर धीरे-धीरे चीनी बनाती हैं । अत: आलू, शकरकंद आदि कम खानी चाहिए। अगर आप आलू खाना ही चाहते हैं तो आप मटर आलू कभी न खाएँ, क्योंकी ये स्टार्च पैदा करेंगे । आलू खाना हो तो आलू मेथी, आलू पालक आदि खाये जा सकते हैं। स्टार्च मानव शरीर में प्रवेश करके पहले मेटबालिक सिंड्रोम पैदा कराता है जो दिल को सेहत मंद रखने के लिए जरूरी है की आप रोजाना तीन फल खाएँ। उनका कहना है कि फल जूस से बेहतर होते हैं, क्योंकी इनमें रेशे होते हैं। फल सलाद से बेहतर हैं ये तीनों फल रंग बिरंगे और अलग-अलग होने चाहिए । यह नहीं की आप तीन सेब खा लें या तीन केले। ये तीनों फल अलग-अलग हों। एक सेब में 3 ग्राम, आड़ू में 5 ग्राम, केले,में 3 ग्राम फाइबर होता है । 10 ग्राम चोकर तथा ये तीन रंगबिरंगे फल आप को दिल की बीमारी से मुक्त रखने में समर्थ हैं।

इस शोध पर आगे कहा गया है की जब भी आप कुछ खाने का सामन खरीदें तो देखें की उस पर ‘होल’ लिखा है या नहीं जिसका अर्थ है की यह फाइबर युक्त है । जैसे डबलरोटी या आटा उस पर ‘होल’ लिखा होना चाहिए । जिस पर ‘एनरिच’ लिखा हूआ हो उसका अर्थ है की वह स्टार्च युक्त है और उसे खाने से परहेज करना चाहिए । कई खाद्यान्नों के ऊपर लिखा रहता है ‘एनरिच’ जो की दिल के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता है । शोध में आगे कहा गया है की चीनी की अपेक्षा गुड़ ज्यादा अच्छा है । ब्राउन आटा सफेद आटे की तुलना में ज्यादा अच्छा है । डॉ. मैकायोन ने लोगों को मैदा कल्चर से बचने की सलाह दी है ।

उपर्युक्त स्पष्टीकरण से स्पष्ट है कि फाइबर के रूप में चोकर का प्रयोग न केवल मधुमेह के रोगियों के लिए बल्कि अन्य सभी के लिए भी अत्यंत लाभदायक है

मधुमेह और मेथी






मेथी मधुमेह को नियंत्रित करती है।
नवीन अनुसंधानों ने मधुमेह के नियंत्रण में मेथी की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया है । प्राचीन समय से ही हमारे रसोईघरों में मेथी का प्रयोग कई रूपों में होता रहा हैं । मेथी के बीजों में काफी मात्रा में फाइबर होता है । इसमें ट्राईगोनेलीन नामक एक एल्केलाएंड भी पाया गया है । जिसका कार्य रक्त में शर्करा के स्तर को कम करना है । मेथी का प्रयोग मधुमेह के दोनों वर्गो, इंसुलिन पर निर्भर एवं इंसुलिन पर अनिर्भर में किया जा सकता है । यह रक्त में कोलेस्ट्रोल एवं ट्राईग्लिसराईडस के स्तर को भी कम करने में मदद करती है ।

मधुमेह नियंत्रण में मेथी के महत्व को देखते हुए प्राय: सभी प्राकृतिक चिकित्सालयों एवं योग केन्द्रों में मधुमेह के रोगियों के आहार में मेथी का प्रयोग अंकुरित के रूप में तथा मेथी पानी के रूप में काफी लम्बे समय से किया जाता रहा है ।

दाना मेथी में क्या- क्या चीजें पायी जाती हैं ?
मधुमेह दे रोगियों के लिए गुणकारी दाना मेथी की 100 ग्राम मात्रा का खाद्य मूल्य निम्नलिखित है –

कार्बोहाइड्रेट             10 ग्राम
प्रोटीन                    4 ग्राम
वसा                       1 ग्राम
कैलशियम               455 मिली ग्राम
फास्फोरस               49 मिली ग्राम
लोहा                      17 मिली ग्राम
विटामिन ए            6450 आई. यू.
विटामिन बि 1       49 एम. सी. ग्राम
विटामिन बी 2        165 एम्. सी. ग्राम
नियासिन                0.7 मिली ग्राम
पाचन समय           2 घंटे
कैलोरी                    48

औषधीय गुणों से भरपूर मेथी की पत्तियों में ट्राईगोथीन होता है । इसके सब्जी यकृत, हृदय और मस्तिष्क संबंधी विकारों के लिए एक उत्तम औषधि माना जाता है । मधुमेह की प्रारंभिक आवस्था में मेथी की ताज़ी पत्तियों का रस प्रात: काल नियमित रूप से तीन महीने तक लिया जा सकता है ।

मधुमेह के रोगी को दाना मेथी का सेवन किस प्रकार से करना चाहिए ?

मधुमेह के रोगी दाना मेथी को कई प्रकार का सेवन किस प्रकार से करना चाहिए ?
दाना मेथी को उबालकर उसका क्वाथ बनाकर
दाना मेथी को भिगोकर उसका पानी पीकर
दाना मेथी को अंकुरित करके
दाना मेथी को पीसकर उसका पाउडर बनाकर

प्रकृतिक चिकित्सा केन्द्रों में मेथी को अंकुरित करके प्रयोग में लाया जाता है । यह अत्यंत सुगम एवं सुविधाजनक है । मेथी के अंकुर अत्यंत पुष्ट एवं आकर्षक होते हैं । इतना ही नहीं अंकुरित होने के पश्चात् मेथी की कडुवाहट भी काफी हद तक कम हो जाती है ।

अन्य उपयोगी फलों का उपयोग
मधुमेह के रोगियों को जामुन, करेला, नीम तथा बेलपत्र आदि के प्रयोग की सलाह भी दी जाती है । ये मधुमेह के नियंत्रण में मदद करती हैं।

ऐसा माना जाता है की एय चीजें रक्त में शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करती हैं । इसलिए प्राय: मधुमेह के रोगियों द्वारा इनका प्रयोग किया जाता है । कागजी नींबू का रस ताजे पानी में निचोड़कर दिन में एक दो बार पीना चाहिए । ताजे आंवले का रस रोज लेना इस रोग इस रोग में अत्यंत लाभकारी पाया गया है । जामुन का थोड़ा-थोड़ा रस दिन में चार बार पीना भी इस रोग में हितकारी माना जाता है । ताजे बेल पत्रों को पीसकर उनका 10 मिली रस या करेले का आधा कप रस प्रात: उठने पर लेना चाहिए । रक्त में शर्करा के स्तर को ध्यान में रखते हुए तथा चिकित्सा के निर्देशानूसर इन सभी का प्रयोग आवश्यक्तानूसार किया जा सकता है ।


करेला मधुमेह में किस प्रकार से लाभ पहुँचाता है ?
प्राचीन समय से ही करेले का प्रयोग मधुमेह की चिकित्सा के लिए किया जाता रहा है । पुस्तक के लेखक डॉ. अमन ने मधुमेह रोग पर करेला, दाना मेथी और धनिया के प्रयोग द्वारा किए गए एक अनूसंधान का संदर्भ दिया है । यह अनूसंधान कार्य 1957 से 1967 के बीच किया गया था जिसमें कुल 210 रोगियों को चिकित्सा दी गई । उनमें से 190 पुरूष तथा 20 महिलाएँ थीं । रोगियों को तीन समूहों में बाँटा गया –

-प्रथम समूह के रोगियों को एक औंस ताजा करेले का रस दिन में एक बार खाली पेट 3 महीने तक दिया गया । साथ में निम्न कार्बोहाइड्रेट आहार देते हुए मूत्र में शर्करा की नियमित जाँच की गई ।

-दूसरे समूह के रोगियों को एक औंस करेले का रस, दाना मेथी का क्वाथ तीन महीने लिए दिया गया ।

-तीसरे समूह के रोगियों को करेले का रस, दाना मेथी का क्वाथ एवं सप्तरंगी की छाल का क्वाथ तीन माह के लिए किया गया ।

लेखक का निष्कर्ष था की करेले के रस की हैपोग्लैसिमिक क्रिया से ऐसे रोगियों को लाभ मिल सकता है जो नियमित रूप से इन्सुलिन का प्रयोग नहीं करते हैं । यहाँ तक कि जब अन्य मधुमेहरोधी औषिधियाँ लाभ पहूँचाने में असफल रहती हैं । यह स्पष्ट संकेत करता है कि करेले का प्रभाव अन्य मौखिक एंटीबायोटिक औषिधियाँ से भिन्न है तथा यह अग्नाशय की बीटा कोशिकाओं को उत्तेजित करता है चाहें उन्होंने इन्सुलिन का स्राव बंद कर दिया हो ।

करेले में क्या–क्या चीजें पायी जाती हैं ?
100 ग्राम करेले का अनुमानित खाद्य मूल्य इस प्रकार है –

कार्बोहाइड्रेट             9 ग्राम
प्रोटीन                    9 ग्राम
वसा                       1 ग्राम
कैलशियम               35 मिली ग्राम
फास्फोरस               140 मिली ग्राम
लोहा                      5.4 मिली ग्राम
विटामिन ए            210 आई.यू.
विटामिन बी-1        70 एम्. सी. जी.
विटामिन बी- 2      95 एम्. सी. जी.
नियासिन                0. 4 मिली ग्राम
विटामिन सी           87 मिली ग्राम
पाचन समय           2 घंटे
कैलोरी                    60

औषिधीय गुणों से भरपूर करेले का प्रयोग मधुमेह के रोगियों के लिए अत्यंत लाभदायक माना जाता है । ‘ रस पीओ कायाकल्प करो’ पुस्तक के लेखक कांति भट्ट और मनहर डी.शाह ने मधुमेह के रोगियों को गाजर, पालक, गोभी, नारियल, सेलेरी तथा करेले का रस लेने का परामर्श दिया है ।

मधुमेह के नियंत्रण में सहयोगी कुछ अन्य प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के बारे में बताएँ ।

निम्नलिखित खाद्य पदार्थ वयस्कों में डायबिटीज ( टाइप – 2) में रक्त में चीनी की मात्रा कम रखने में सहायक होते हैं ।

मेथी – मेथी के बीज रक्त में चीनी की मात्रा कम करते हैं, इन्सुलिन का स्तर भी घटाते खराब कोलेस्ट्रोल कम करते हैं और अच्छा बढ़ाते हैं ।

एलोवेरा – एलोवेरा की पत्तियों के अंदर का रस प्रभावशाली है ।
प्रिकली पियर – इसमें ऐसे फाइबर होते हैं जो चीची के अणुओं के झटका देते हैं और रक्त में उनका जाना धीमा कर देते हैं ।

ग्रीन टी – इसमें कुछ तत्व बुनियादी और इन्सुलिन आधारित ग्लूकोज का उपयोग बढ़ा देता हैं ।
लहसुन – ग्लूकोज का स्तर कम करता है, फ्री इन्सुलिन की मात्रा बढ़ाता है ।
दालचीनी- इन्सुलिन के प्रभाव को तिगुना कर देती है ।
कोको – इसमें फ्लेवेनाएडस होते हैं जो शरीर में चीनी का उपापचय बढ़ा देते हैं ।
करेला – शरीर में ग्लूकोज का उपयोग बढ़ा देता हैं, रक्त में ग्लूकोज का बनना कम करता है, करेले का रस या इसके बीज उपयोगी है ।
स्टिंगीगं नेटल – इसकी जड़ें और पत्तियाँ रक्त में चीनी का स्तर कम करती हैं ।
निषेधों का पालन

मधुमेह के रोगियों को अपने आहार में क्या-क्या सम्मिलित नहीं करना चाहिए।
प्रसिद्ध प्राकृतिक चिकित्सा डॉ. हीरालाल ने अपनी पुस्तक “स्वस्थ आहार एवं रोगों की चिकित्सा’ में स्वास्थ बिगाड़ने वाले निम्नलिखित खाद्यों की एक सूची दी है । मधुमेह के रोगियों को भी इनसे बचना चाहिए ।
तम्बाकू ( जर्दा, खैनी, गुटका, बीड़ी, सिगरेट एवं सिगार के रूप में )
काफी, चाय, चाकलेट, कहवा कोका कोला आदि।
नमक का अधिक प्रयोग किन्तु नमक न लेना सर्वोत्तम है ।
मद्यसार का उपयोग ।
हानिप्रद गरम मसाले ।
परिष्कृत सफेद चीनी, सफ़ेद मैदा एवं वनस्पति घी और इससे बनाए गए समस्त खाद्य, पावरोटी, बिस्कुट, पूड़ी, मिठाई, नमकीन एवं आइसक्रीम आदि ।
सभी प्रक्रियागत परिष्कृ, डिब्बा बंद, परिरक्षित एवं फैक्ट्री में बनाए गए खाद्य ।
सभी बासी एवं दूर्गंधित खाद्य ।
सभी रासायनिक औषिधियाँ (संभव हो तो बिल्कुल नहीं वर्ना केवल एकदम आपतीकाल् में ही लेना चाहिए
मकान, बाग़, एवं खेत के सभी जहरीले छिडकावयुक्त खाद्य । इसके अतिरिक्त अंडा, मांस, मछली आदि का प्रयोग भी नहीं करना चाहिए ।

मधुमेह के लक्षण



प्रात: उठते ही सर्वप्रथम ये मंत्र पढ़ें, लाभ होगा, प्रार्थना के फायदे





प्रातः काल उठते ही सर्व प्रथम क्या करना चाहिए इसके लिए हिंदू धर्म में बहुत कुछ बताया गया है यहां उठते ही सर्वप्रथम क्या करना चाहिए इसकी जानकारी प्रस्तुत है।

सबसे पहले अपने घर में सोने के स्थान पर भगवान का सुंदर सा फोटो लगाएं ताकि उठते ही सबसे पहले वहीं नजर आएं।

उठते ही हमारी आंखें नींद से भरी होती हैं। ऐसे में यदि दूर की वस्तु या रोशनी हमारी दृष्टि पर पड़ेगी तो आंखों पर कुप्रभाव पड़ेगा। इसलिए जरूरी है की उठते ही हम भगवान के चित्र का दर्शन करें। प्रातः दिखने वाली आकृति का दिन में प्रभाव अवश्य होता है।

भगवान का दर्शन करने के पूर्व प्रातःकाल जागते ही सबसे पहले दोनों हाथों की हथेलियों के दर्शन का विधान बताया गया है। आपका दिन शुभ और सफल हो इसके लिए हथेली और उसके बाद भगवान का दर्शन करें।

यह मंत्र पढ़ें : हाथों की हथेली का दर्शन करके यह मंत्र पढ़ना चाहिए- कराग्रे वसति लक्ष्मीः, कर मध्ये सरस्वती। करमूले तू ब्राह्म, प्रभाते कर दर्शनम्‌‌।।...(कहीं-कहीं 'ब्रह्म' के स्थान पर 'गोविन्दः या 'ब्रह्मां' का प्रयोग किया जाता है।)

भावार्थ : हथेलियों के अग्रभाग में भगवती लक्ष्मी, मध्य भाग में विद्यादात्री सरस्वती और मूल भाग में भगवान गोविन्द (ब्रह्मा) का निवास है। मैं अपनी हथेलियों में इनका दर्शन करता हूं।

यह मंत्र उच्चारित कर हथेलियों को परस्पर घर्षण करके उन्हें अपने चेहरे पर लगाना चाहिए।



हिन्दू मंदिर में जाने के नियम
मंदिर समय : हिन्दू मंदिर में जाने का समय होता है। सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने संध्याकाल माना है। संध्या वंदन को संध्योपासना भी कहते हैं। संधिकाल में ही संध्या वंदना की जाती है। वैसे संधि 5 वक्त (समय) की होती है, लेकिन प्रात:काल और संध्‍याकाल- उक्त 2 समय की संधि प्रमुख है अर्थात सूर्य उदय और अस्त के समय। इस समय मंदिर या एकांत में शौच, आचमन, प्राणायामादि कर गायत्री छंद से निराकार ईश्वर की प्रार्थना की जाती है।

दोपहर 12 से अपराह्न 4 बजे तक मंदिर में जाना, पूजा, आरती और प्रार्थना आदि करना निषेध माना गया है अर्थात प्रात:काल से 11 बजे के पूर्व मंदिर होकर आ जाएं या फिर अपराह्नकाल में 4 बजे के बाद मंदिर जाएं।धरती के दो छोर हैं- एक उत्तरी ध्रुव और दूसरा दक्षिणी ध्रुव। उत्तर में मुख करके पूजा या प्रार्थना की जाती है इसलिए प्राचीन मंदिर सभी मंदिरों के द्वार उत्तर में होते थे। हमारे प्राचीन मंदिर वास्तुशास्त्रियों ने ढूंढ-ढूंढकर धरती पर ऊर्जा के सकारात्मक केंद्र ढूंढे और वहां मंदिर बनाए।

मंदिर में शिखर होते हैं। शिखर की भीतरी सतह से टकराकर ऊर्जा तरंगें व ध्वनि तरंगें व्यक्ति के ऊपर पड़ती हैं। ये परावर्तित किरण तरंगें मानव शरीर आवृत्ति बनाए रखने में सहायक होती हैं। व्यक्ति का शरीर इस तरह से धीरे-धीरे मंदिर के भीतरी वातावरण से सामंजस्य स्थापित कर लेता है। इस तरह मनुष्य असीम सुख का अनुभव करता है।

पुराने मंदिर सभी धरती के धनात्मक (पॉजीटिव) ऊर्जा के केंद्र हैं। ये मंदिर आकाशीय ऊर्जा के केंद्र में स्थित हैं। उदाहरणार्थ उज्जैन का महाकाल मंदिर कर्क पर स्थित है। ऐसे धनात्मक ऊर्जा के केंद्र पर जब व्यक्ति मंदिर में नंगे पैर जाता है तो इससे उसका शरीर अर्थ हो जाता है और उसमें एक ऊर्जा प्रवाह दौड़ने लगता है। वह व्यक्ति जब मूर्ति के जब हाथ जोड़ता है तो शरीर का ऊर्जा चक्र चलने लगता है। जब वह व्यक्ति सिर झुकाता है तो मूर्ति से परावर्तित होने वाली पृथ्वी और आकाशीय तरंगें मस्तक पर पड़ती हैं और मस्तिष्क पर मौजूद आज्ञा चक्र पर असर डालती हैं। इससे शांति मिलती है तथा सकारात्मक विचार आते हैं जिससे दुख-दर्द कम होते हैं और भविष्य उज्ज्वल होता है।


पूजा : पूजा एक रासायनिक क्रिया है। इससे मंदिर के भीतर वातावरण की पीएच वैल्यू (तरल पदार्थ नापने की इकाई) कम हो जाती है जिससे व्यक्ति की पीएच वैल्यू पर असर पड़ता है। यह आयनिक क्रिया है, जो शारीरिक रसायन को बदल देती है। यह क्रिया बीमारियों को ठीक करने में सहायक होती है। दवाइयों से भी यही क्रिया कराई जाती है, जो मंदिर जाने से होती है।

प्रार्थना : प्रार्थना में शक्ति होती है। प्रार्थना करने वाला व्यक्ति मंदिर के ईथर माध्यम से जुड़कर अपनी बात ईश्वर तक पहुंचा सकता है। दूसरा यह कि प्रार्थना करने से मन में विश्‍वास और सकारात्मक भाव जाग्रत होते हैं, जो जीवन के विकास और सफलता के अत्यंत जरूरी हैं।

निषिद्ध आचरण : शास्त्रों में जो मना किया गया है उसे करना पाप और कर्म को बिगाड़ने माना गया है। यहां प्रस्तुत हैं कुछ प्रमुख आचरण जिन्हें मंदिर में नहीं करना चाहिए अन्यथा आपकी प्रार्थना या पूजा निष्फल तो होती ही है, साथ ही आप देवताओं की नजरों में गिर जाते हो।

1. मंदिर में बगैर आचमन क्रिया के नहीं जाना चाहिए। पवित्रता का विशेष ध्यान रखें। कई लोग मोजे पहनकर भी चले जाते हैं।

2. मंदिर में किसी भी प्रकार का वार्तालाप वर्जित माना गया है।

3. मंदिर में कभी भी मूर्ति के ठीक सामने खड़े नहीं होते।

4. दुर्गा और हनुमान मंदिर में सिर ढंककर जाते हैं।

5. मंदिर में जाने का समय- मंदिर में संध्यावंदन के समय जाते हैं। 12 से 4 के बीच कभी मंदिर नहीं जाते।

6. भजन-कीर्तन आदि के दौरान किसी भी भगवान का वेश बनाकर खुद की पूजा करवाना वर्जित।

इस तरह मंदिर के कई नियम हैं जिनका पालन करना चाहिए।
संध्योपासना के 5 प्रकार हैं- (1) प्रार्थना, (2) ध्यान, (3) कीर्तन, (4) यज्ञ और (5) पूजा-आरती। व्यक्ति की जिस में जैसी श्रद्धा है वह वैसा करता है। लेकिन इन पांचों में किसका ज्यादा महत्व है, यह भी जानना जरूरी है।

प्रार्थना का प्रचलन सभी धर्मों में है, लेकिन प्रार्थना करने के तरीके अलग-अलग हैं। तरीके कैसे भी हों जरूरी है प्रार्थना करना। प्रार्थना योग भी अपने आप में एक अलग ही योग है, लेकिन कुछ लोग इसे योग के तप और ईश्वर प्राणिधान का हिस्सा मानते हैं। प्रार्थना को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य प्राप्त करने की एक क्रिया भी माना जाता है।

कैसे करें प्रार्थना : ईश्वर, भगवान, देवी-देवता या प्रकृति के समक्ष प्रार्थना करने से मन और तन को शांति मिलती है। मंदिर, घर या किसी एकांत स्थान पर खड़े होकर या फिर ध्यान मुद्रा में बैठकर दोनों हाथों को नमस्कार मुद्रा में ले आएं। अब मन-मस्तिष्क को एकदम शांत और शरीर को पूर्णत: शिथिल कर लें और आंखें बद कर अपना संपूर्ण ध्यान अपने ईष्ट पर लगाएं। 15 मिनट तक एकदम शांत इसी मुद्रा में रहें तथा सांस की क्रिया सामान्य कर दें।

भक्ति के प्रकार : 1.आर्त, 2.जिज्ञासु, 3.अर्थार्थी और 4.ज्ञानी
प्रार्थना के प्रकार : 1.आत्मनिवेदन, 2.नामस्मरण, 3.वंदन और 4. संस्कृत भाषा में समूह गान।

प्रार्थना के फायदे : प्रार्थना में मन से जो भी मांगा जाता है वह फलित होता है। ईश्वर प्रार्थना को 'संध्या वंदन' भी कहते हैं। संध्या वंदन ही प्रार्थना है। यह आरती, जप, पूजा या पाठ, तंत्र, मंत्र आदि क्रियाकांड से भिन्न और सर्वश्रेष्ठ है।

प्रार्थना से मन स्थिर और शांत रहता है। इससे क्रोध पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इससे स्मरण शक्ति और चेहरे की चमक बढ़ जाती है। प्रतिदिन इसी तरह 15-20 मिनट प्रार्थना करने से व्यक्ति अपने आराध्य से जुड़ने लगता है और धीरे-धीरे उसके सारे संकट समाप्त होने लगते हैं। प्रार्थना से मन में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है तथा शरीर निरोगी बनता है।

अंत में ध्यान.
ध्यान का अर्थ : ध्यान का अर्थ एकाग्रता नहीं होता। एकाग्रता टॉर्च की स्पॉट लाइट की तरह होती है जो किसी एक जगह को ही फोकस करती है, लेकिन ध्यान उस बल्ब की तरह है जो चारों दिशाओं में प्रकाश फैलाता है। आमतौर पर आम लोगों का ध्यान बहुत कम वॉट का हो सकता है, लेकिन योगियों का ध्यान सूरज के प्रकाश की तरह होता है जिसकी जद में ब्रह्मांड की हर चीज पकड़ में आ जाती है।

हिंदू धर्म के 10 पवित्र वृक्ष, जानिए उनका रहस्य


पीपल देव : 
हिंदू धर्म में पीपल का बहुत महत्व है। पीपल के वृक्ष को संस्कृत में प्लक्ष भी कहा गया है। वैदिक काल में इसे अश्वार्थ इसलिए कहते थे, क्योंकि इसकी छाया में घोड़ों को बांधा जाता था। अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। औषधीय गुणों के कारण पीपल के वृक्ष को 'कल्पवृक्ष' की संज्ञा दी गई है। पीपल के वृक्ष में जड़ से लेकर पत्तियों तक तैंतीस कोटि देवताओं का वास होता है और इसलिए पीपल का वृक्ष प्रात: पूजनीय माना गया है। उक्त वृक्ष में जल अर्पण करने से रोग और शोक मिट जाते हैं।

पीपल के प्रत्येक तत्व जैसे छाल, पत्ते, फल, बीज, दूध, जटा एवं कोपल तथा लाख सभी प्रकार की आधि-व्याधियों के निदान में काम आते हैं। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में पीपल को अमृततुल्य माना गया है। सर्वाधिक ऑक्सीजन निस्सृत करने के कारण इसे प्राणवायु का भंडार कहा जाता है। सबसे अधिक ऑक्सीजन का सृजन और विषैली गैसों को आत्मसात करने की इसमें अकूत क्षमता है।

गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं, 'हे पार्थ वृक्षों में मैं पीपल हूं।'
।।मूलतः ब्रह्म रूपाय मध्यतो विष्णु रुपिणः। अग्रतः शिव रुपाय अश्वत्त्थाय नमो नमः।।
भावार्थ-अर्थात इसके मूल में ब्रह्म, मध्य में विष्णु तथा अग्रभाग में शिव का वास होता है। इसी कारण 'अश्वत्त्थ'नामधारी वृक्ष को नमन किया जाता है।-पुराण

पीपल परिक्रमा : 
स्कन्द पुराण में वर्णित पीपल के वृक्ष में सभी देवताओं का वास है। पीपल की छाया में ऑक्सीजन से भरपूर आरोग्यवर्धक वातावरण निर्मित होता है। इस वातावरण से वात, पित्त और कफ का शमन-नियमन होता है तथा तीनों स्थितियों का संतुलन भी बना रहता है। इससे मानसिक शांति भी प्राप्त होती है। पीपल की पूजा का प्रचलन प्राचीन काल से ही रहा है। इसके कई पुरातात्विक प्रमाण भी है।

अश्वत्थोपनयन व्रत के संदर्भ में महर्षि शौनक कहते हैं कि मंगल मुहूर्त में पीपल वृक्ष की नित्य तीन बार परिक्रमा करने और जल चढ़ाने पर दरिद्रता, दु:ख और दुर्भाग्य का विनाश होता है। पीपल के दर्शन-पूजन से दीर्घायु तथा समृद्धि प्राप्त होती है। अश्वत्थ व्रत अनुष्ठान से कन्या अखण्ड सौभाग्य पाती है।

पीपल पूजा : 
शनिवार की अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और सात परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसो के तेल के दीपक को जलाकर छायादान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है। अनुराधा नक्षत्र से युक्त शनिवार की अमावस्या के दिन पीपल वृक्ष के पूजन से शनि पीड़ा से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। श्रावण मास में अमावस्या की समाप्ति पर पीपल वृक्ष के नीचे शनिवार के दिन हनुमान की पूजा करने से सभी तरह के संकट से मुक्ति मिल जाती है




 बरगद या वटवृक्ष : 
बरगद को वटवृक्ष कहा जाता है। हिंदू धर्म में वट सावत्री नामक एक त्योहार पूरी तरह से वट को ही समर्पित है। पीपल के बाद बरगद का सबसे ज्यादा महत्व है। पीपल में जहां भगवान विष्णु का वास है वहीं बरगद में ब्रह्मा, विश्णु और शिव का वास माना गया है। हालांकि बरगद को साक्षात शिव कहा गया है। बरगद को देखना शिव के दर्शन करना है।

हिंदू धर्मानुसार पांच वटवृक्षों का महत्व अधिक है। अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट के बारे में कहा जाता है कि इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त पांच वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है। प्रयाग में अक्षयवट, नासिक में पंचवट, वृंदावन में वंशीवट, गया में गयावट और उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है।

।।तहं पुनि संभु समुझिपन आसन। बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ-अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों, यहां तक कि देवताओं ने भी वट वृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।- रामचरित मानस



आम है खास : 
हिंदू धर्म में जब भी कोई मांगलिक कार्य होते हैं तो घर या पूजा स्थल के द्वार व दीवारों पर आम के पत्तों की लड़ लगाकर मांगलिक उत्सव के माहौल को धार्मिक और वातावरण को शुद्ध किया जाता है।

अक्सर धार्मिक पंडाल और मंडपों में सजावट के लिए आम के पत्तों का इस्तेमाल किया जाता है। आम के वृक्ष की हजारों किस्में हैं और इसमें जो फल लगता है वह दुनियाभर में प्रसिद्ध है। आम के रस से कई प्रकार के रोग दूर होते हैं।



भविष्यवक्ता शमी : 
विक्रमादित्य के समय में सुप्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर ने अपने 'बृहतसंहिता'नामक ग्रंथ के 'कुसुमलता'नाम के अध्याय में वनस्पति शास्त्र और कृषि उपज के संदर्भ में जो जानकारी प्रदान की है उसमें शमीवृक्ष अर्थात खिजड़े का उल्लेख मिलता है।

वराहमिहिर के अनुसार जिस साल शमीवृक्ष ज्यादा फूलता-फलता है उस साल सूखे की स्थिति का निर्माण होता है। विजयादशमी के दिन इसकी पूजा करने का एक तात्पर्य यह भी है कि यह वृक्ष आने वाली कृषि विपत्ती का पहले से संकेत दे देता है जिससे किसान पहले से भी ज्यादा पुरुषार्थ करके आनेवाली विपत्ती से निजात पा सकता है।


बिल्व वृक्ष : 
बिल्व अथवा बेल (बिल्ला) विश्व के कई हिस्सों में पाया जाने वाला वृक्ष है। भारत में इस वृक्ष का पीपल, नीम, आम, पारिजात और पलाश आदि वृक्षों के समान ही बहुत अधिक सम्मान है। हिन्दू धर्म में बिल्व वृक्ष भगवान शिव की अराधना का मुख्य अंग है।
धार्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है। बिल्व वृक्ष की तासीर बहुत शीतल होती है। गर्मी की तपिश से बचने के लिए इसके फल का शर्बत बड़ा ही लाभकारी होता है। यह शर्बत कुपचन, आंखों की रोशनी में कमी, पेट में कीड़े और लू लगने जैसी समस्याओं से निजात पाने के लिए उत्तम है। औषधीय गुणों से परिपूर्ण बिल्व की पत्तियों मे टैनिन, लोह, कैल्शियम, पोटेशियम और मैग्नेशियम जैसे रसायन पाए जाते हैं।

बेल वृक्ष की उत्पत्ति के संबंध में 'स्कंदपुराण' में कहा गया है कि एक बार देवी पार्वती ने अपनी ललाट से पसीना पोछकर फेंका, जिसकी कुछ बूंदें मंदार पर्वत पर गिरीं, जिससे बेल वृक्ष उत्पन्न हुआ। इस वृक्ष की जड़ों में गिरिजा, तना में महेश्वरी, शाखाओं में दक्षयायनी, पत्तियों में पार्वती, फूलों में गौरी और फलों में कात्यायनी वास करती हैं।

कहा जाता है कि बेल वृक्ष के कांटों में भी कई शक्तियाँ समाहित हैं। यह माना जाता है कि देवी महालक्ष्मी का भी बेल वृक्ष में वास है। जो व्यक्ति शिव-पार्वती की पूजा बेलपत्र अर्पित कर करते हैं, उन्हें महादेव और देवी पार्वती दोनों का आशीर्वाद मिलता है। 'शिवपुराण' में इसकी महिमा विस्तृत रूप में बतायी गयी है।


अशोक वृक्ष : 
अशोक वृक्ष को हिन्दू धर्म में बहुत ही पवित्र और लाभकारी माना गया है। अशोक का शब्दिक अर्थ होता है- किसी भी प्रकार का शोक न होना। मांगलिक एवं धार्मिक कार्यों में अशोक के पत्तों का प्रयोग किया जाता है।
माना जाता है कि अशोक वृक्ष घर में लगाने से या इसकी जड़ को शुभ मुहूर्त में धारण करने से मनुष्य को सभी शोकों से मुक्ति मिल जाती है। अशोक का वृक्ष वात-पित्त आदि दोष, अपच, तृषा, दाह, कृमि, शोथ, विष तथा रक्त विकार नष्ट करने वाला है। यह रसायन और उत्तेजक है। इसके उपयोग से चर्म रोग भी दूर होता है। अशोक का वृक्ष घर में उत्तर दिशा में लगाना चाहिए जिससे गृह में सकारात्मक ऊर्जा का संचारण बना रहता है। घर में अशोक के वृक्ष होने से सुख, शांति एवं समृद्धि बनी रहती है एवं अकाल मृत्यु नहीं होती।

अशोक का वृक्ष दो प्रकार का होता है- एक तो असली अशोक वृक्ष और दूसरा उससे मिलता-जुलता नकली अशोक वृक्ष। नकली अशोक वृक्ष देवदार की जाति का लंबा वृक्ष होता है। इसके पत्ते आम के पत्तों जैसे होते हैं। इसके फूल सफेद, पीले रंग के और फल लाल रंग के होते हैं।

असली अशोक का वृक्ष आम के पेड़ जैसा छायादार वृक्ष होता है। इसके पत्ते 8-9 इंच लंबे और दो-ढाई इंच चौड़े होते हैं। इसके पत्ते शुरू में तांबे जैसे रंग के होते हैं इसीलिए इसे 'ताम्रपल्लव' भी कहते हैं। इसके नारंगी रंग के फूल वसंत ऋतु में आते हैं, जो बाद में लाल रंग के हो जाते हैं। सुनहरे लाल रंग के फूलों वाला होने से इसे 'हेमपुष्पा' भी कहा जाता है।


नारियल का वृक्ष :
 हिन्दू धर्म में नारियल के बगैर तो कोई मंगल कार्य संपन्न होता ही नहीं। नारियल का खासा धार्मिक महत्व है। 60 फुट से 100 फुट तक ऊंचा नारियल का पेड़ लगभग 80 वर्षों तक जीवित रहता है। 15 वर्षों के बाद पेड़ में फल लगते हैं।
पूजा के दौरान कलश में पानी भरकर उसके ऊपर नारियल रखा जाता है। यह मंगल प्रतीक है। नारियल का प्रसाद भगवान को चढ़ाया जाता है।

पेड़ का प्रत्येक भाग किसी न किसी काम में आता है। ये भाग किसानों के लिए बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं। इसे घरों के पाट, फर्नीचर आदि बनाए जाते हैं। पत्तों से पंखे, टोकरियां, चटाइयां आदि बनती हैं। इसकी जटा से रस्सी, चटाइयां, ब्रश, जाल, थैले आदि अनेक वस्तुएं बनती हैं। यह गद्दों में भी भरा जाता है। नारियल का तेल सबसे ज्यादा बिकता है।

नारियल के पानी में पोटेशियम अधिक मात्रा में होता है। इसे पीने से शरीर में किसी भी प्रकार की सुन्नता नहीं रहती। अगर आप पाचन की समस्या से ग्रसित हैं तो 1 गिलास नारियल का पानी लें, उसमें अन्ननास का जूस मिलाएं और पूरे 9 दिन तक नाश्ते से पहले उसे पीएं। इसे पीने के बाद 2 घंटे तक किसी भी प्रकार का भोजन न करें और न ही कोई अन्य पेय पीएं।

नारियल के गूदे का इस्तेमाल नाड़ियों की समस्या, कमजोरी, स्मृति नाश, पल्मनरी अफेक्शन्स (फेफड़ों के रोगों) के उपचार के लिए किया जाता है। यह त्वचा संबंधी तथा आंतड़ियों संबंधी समस्याओं को भी दूर करता है। अस्थमा से पीड़ित व्यक्तियों को भी नारियल पानी पीने की सलाह दी जाती है।


अनार : 
अनार के वृक्ष से जहां सकारात्मक ऊर्जा का निर्माण होता हैं वहीं इस वृक्ष के कई औषधीय गुण भी हैं। पूजा के दौरान पंच फलों में अनार की गिनती की जाती है।

अनार को दाडम या दाड़िम आदि अलग-अलग नाम से जानते हैं। अनार का वृक्ष भी बहुत ही सुंदर होता है जिसे बगिया की शोभा के लिए भी लगाया जा सकता है। इसकी कली, फूल और फल भी कुछ कम सुंदर नहीं होते।

अनार का प्रयोग करने से खून की मात्रा बढ़ती है। इससे त्वचा सुंदर व चिकनी होती है। रोज अनार का रस पीने से या अनार खाने से त्वचा का रंग निखरता है। अनार के छिलकों के एक चम्मच चूर्ण को कच्चे दूध और गुलाब जल में मिलाकर चेहरे पर लगाने से चेहरा दमक उठता है। अपच, दस्त, पेचिश, दमा, खांसी, मुंह में दुर्गंध आदि रोगों में अनार लाभदायक है। इसके सेवन से शरीर में झुर्रियां या मांस का ढीलापन समाप्त हो जाता है।


नीम का वृक्ष :
 नीम एक चमत्कारी वृक्ष माना जाता है। नीम जो प्रायः सर्व सुलभ वृक्ष आसानी से मिल जाता है। नीम को संस्कृत में निम्ब कहा जाता है। यह वृक्ष अपने औषधीय गुणों के कारण पारंपरिक इलाज में बहुपयोगी सिद्ध होता आ रहा है। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे प्राचीन चिकित्सा ग्रंथों में इसका उल्लेख मिलता है।

निम्ब शीतों लघुग्राही कतुर कोअग्नी वातनुत।
अध्यः श्रमतुटकास ज्वरारुचिक्रिमी प्रणतु ॥

अर्थात नीम शीतल, हल्का, ग्राही पाक में चरपरा, हृदय को प्रिय, अग्नि, वाट, परिश्रम, तृषा, अरुचि, क्रीमी, व्रण, कफ, वामन, कोढ़ और विभिन्न प्रमेह को नष्ट करता है।

नीम के पेड़ का औषधीय के साथ-साथ धार्मिक महत्त्व भी है। मां दुर्गा का रूप माने जाने वाले इस पेड़ को कहीं-कहीं नीमारी देवी भी कहते हैं। इस पेड़ की पूजा की जाती है। कहते हैं कि नीम की पत्तियों के धुएं से बुरी और प्रेत आत्माओं से रक्षा होती है।


केले का पेड़ : 
केले का पेड़ काफी पवित्र माना जाता है और कई धार्मिक कार्यों में इसका प्रयोग किया जाता है। भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी को केले का भोग लगाया जाता है। केले के पत्तों में प्रसाद बांटा जाता है। माना जाता है कि समृद्धि के लिए केले के पेड़ की पूजा अच्छी होती है।

"श्री मद्-भगवत गीता"के बारे में


ॐ . किसको किसने सुनाई?
उ. श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सुनाई।

ॐ . कब सुनाई?उ.- आज से लगभग 7 हज़ार साल पहले सुनाई।

ॐ. भगवान ने किस दिन गीता सुनाई?
उ.- रविवार के दिन।

ॐ. कोन सी तिथि को?
उ.- एकादशी

ॐ. कहाँ सुनाई?उ.- कुरुक्षेत्र की रणभूमि में।

ॐ. कितनी देर में सुनाई?
उ.- लगभग 45 मिनट में

ॐ. क्यू सुनाई?
उ.- कर्त्तव्य से भटके हुए अर्जुन को कर्त्तव्य सिखाने के लिए और आने वाली पीढियों को धर्म-ज्ञान सिखाने के लिए।

ॐ. कितने अध्याय है?
उ.- कुल 18 अध्याय

ॐ. कितने श्लोक है?
उ.- 700 श्लोक

ॐ. गीता में क्या-क्या बताया गया है?
उ.- ज्ञान-भक्ति-कर्म योग मार्गो की विस्तृत व्याख्या की गयी है, इन मार्गो पर चलने से व्यक्ति निश्चित ही परमपद का अधिकारी बन जाता है।

ॐ. गीता को अर्जुन के अलावा और किन किन लोगो ने सुना?
उ.- धृतराष्ट्र एवं संजय ने

ॐ. अर्जुन से पहले गीता का पावन ज्ञान किन्हें मिला था?उ.- भगवान सूर्यदेव को

ॐ. गीता की गिनती किन धर्म-ग्रंथो में आती है?
उ.- उपनिषदों में

ॐ. गीता किस महाग्रंथ का भाग है....?
उ.- गीता महाभारत के एक अध्याय शांति-पर्व का एक हिस्सा है।

ॐ. गीता का दूसरा नाम क्या है?
उ.- गीतोपनिषद

ॐ. गीता का सार क्या है?
उ.- प्रभु श्रीकृष्ण की शरण लेना

ॐ. गीता में किसने कितने श्लोक कहे है?
उ.- श्रीकृष्ण जी ने- 574
अर्जुन ने- 85
धृतराष्ट्र ने- 1
संजय ने- 40.

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